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राजकोषीय नीति: कर, खर्च और बजट
राजकोषीय नीति के अर्थ, विस्तारकारी-संकुचनकारी रूप, बजट घाटे के प्रकार, सार्वजनिक ऋण और राजकोषीय गुणक की संतुलित समझ।
राजकोषीय नीति क्या है? सरकार के दो हथियार
राजकोषीय नीति सरकार द्वारा अपने खर्च और करों के माध्यम से अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की नीति है। इसके दो मुख्य उपकरण हैं: सार्वजनिक व्यय (बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य, सब्सिडी, वेतन) और कराधान (आयकर, GST जैसे अप्रत्यक्ष कर)। जब सरकार खर्च बढ़ाती है या कर घटाती है, तो लोगों के हाथ में अधिक धन आता है, मांग बढ़ती है और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है — इसे विस्तारकारी नीति कहते हैं, जो मंदी में अपनाई जाती है। जब सरकार खर्च घटाती है या कर बढ़ाती है, तो मांग ठंडी होती है और महंगाई पर अंकुश लगता है — इसे संकुचनकारी नीति कहते हैं। वार्षिक बजट इसी नीति का सबसे बड़ा दस्तावेज़ है।
विस्तारकारी = खर्च बढ़ाओ / कर घटाओ (मंदी में)। संकुचनकारी = खर्च घटाओ / कर बढ़ाओ (तेज़ महंगाई में)।
बजट घाटे के तीन चेहरे
जब सरकार का खर्च उसकी प्राप्तियों से अधिक होता है, तो घाटा होता है। राजस्व घाटा = राजस्व व्यय − राजस्व प्राप्तियां; यह बताता है कि सरकार रोज़मर्रा के खर्चों के लिए भी उधार ले रही है, जो चिंताजनक है। राजकोषीय घाटा = कुल व्यय − ऋण-रहित प्राप्तियां; यह सरकार की कुल उधारी आवश्यकता दर्शाता है और सबसे व्यापक माप है। प्राथमिक घाटा = राजकोषीय घाटा − ब्याज भुगतान; यह बताता है कि पुराने ऋण के ब्याज को हटाकर वर्तमान नीति कितनी घाटे में है। घाटे अपने आप में बुरे नहीं हैं — मंदी में घाटा बढ़ाना अर्थव्यवस्था को सहारा देता है — लेकिन स्थायी और बढ़ता घाटा ब्याज बोझ बढ़ाकर भविष्य की नीति को जकड़ लेता है।
राजकोषीय गुणक: एक रुपया, कई गुना असर
सरकारी खर्च का अर्थव्यवस्था पर गुणक प्रभाव होता है। सरकार जब सड़क बनाती है, तो मज़दूरों और ठेकेदारों को आय मिलती है; वे खर्च करते हैं, जिससे दुकानदारों को आय मिलती है, और यह श्रृंखला चलती रहती है। राजकोषीय गुणक बताता है कि एक रुपये के सरकारी खर्च से GDP में कितने रुपये की वृद्धि होती है। मंदी में जब निजी खर्च सुस्त हो, तो गुणक बड़ा होता है क्योंकि सरकारी खर्च बेकार पड़े संसाधनों को काम पर लगाता है। पूर्ण रोज़गार की स्थिति में गुणक छोटा होता है क्योंकि सरकारी खर्च निजी खर्च को विस्थापित कर सकता है। करों में कटौती का गुणक खर्च के गुणक से आमतौर पर छोटा होता है, क्योंकि लोग कटौती का कुछ हिस्सा बचा लेते हैं।
स्वचालित स्थिरक: बिना निर्णय के संतुलन
कुछ राजकोषीय तंत्र बिना किसी नए निर्णय के अर्थव्यवस्था को स्वतः स्थिर करते हैं — इन्हें स्वचालित स्थिरक कहते हैं। मंदी में लोगों की आय घटती है तो कर संग्रह स्वतः घट जाता है (लोगों के हाथ में अधिक धन बचता है) और बेरोज़गारी भत्ते जैसे कल्याण खर्च स्वतः बढ़ जाते हैं — दोनों मांग को सहारा देते हैं। तेज़ी में इसके विपरीत होता है: कर संग्रह बढ़ता है और कल्याण खर्च घटता है, जिससे अर्थव्यवस्था ठंडी होती है। ये स्थिरक नीतिगत निर्णयों की देरी को कम करते हैं। हालांकि विकासशील देशों में कर आधार संकीर्ण और कल्याण तंत्र सीमित होने से स्वचालित स्थिरक अपेक्षाकृत कमज़ोर होते हैं।
सार्वजनिक ऋण: कब चिंता, कब नहीं
लगातार घाटे से सार्वजनिक ऋण बढ़ता है। ऋण का मूल्यांकन GDP के अनुपात में किया जाता है — यही बताता है कि अर्थव्यवस्था अपने ऋण को कितनी आसानी से संभाल सकती है। चिंता तब होती है जब ब्याज भुगतान राजस्व का बड़ा हिस्सा खाने लगे, जिससे विकास खर्च के लिए धन न बचे, या जब ऋण विदेशी मुद्रा में हो और विनिमय जोखिम जुड़ा हो। लेकिन उत्पादक निवेश (बुनियादी ढांचा, शिक्षा) के लिए लिया गया ऋण भविष्य की आय बढ़ाकर खुद को चुका सकता है। सुनहरा नियम है: चालू (राजस्व) खर्च के लिए उधार न लें, पूंजीगत निवेश के लिए उधार ठीक है। राजकोषीय अनुशासन का अर्थ शून्य घाटा नहीं, बल्कि टिकाऊ और उत्पादक घाटा है।
घाटा अपने आप में बुरा नहीं — प्रश्न यह है कि उधार लेकर क्या किया गया: रोज़मर्रा का खर्च या भविष्य की आय बढ़ाने वाला निवेश?
मुख्य बिंदु
- राजकोषीय नीति = सरकारी खर्च + कराधान; विस्तारकारी (मंदी में) बनाम संकुचनकारी (महंगाई में)
- राजकोषीय घाटा = सरकार की कुल उधारी आवश्यकता; प्राथमिक घाटा = ब्याज हटाकर
- राजस्व घाटा (रोज़मर्रा खर्च हेतु उधार) चिंताजनक; पूंजीगत निवेश हेतु उधार स्वीकार्य
- राजकोषीय गुणक: मंदी में बड़ा, पूर्ण रोज़गार में छोटा; खर्च का गुणक कर कटौती से बड़ा
- स्वचालित स्थिरक (कर, कल्याण खर्च) बिना निर्णय के अर्थव्यवस्था को संतुलित करते हैं
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
राजकोषीय घाटा और राजस्व घाटा में क्या अंतर है?
राजकोषीय घाटा सरकार की कुल उधारी आवश्यकता है (कुल व्यय − ऋण-रहित प्राप्तियां)। राजस्व घाटा केवल रोज़मर्रा (राजस्व) खाते का घाटा है — यह बताता है कि सरकार चालू खर्चों के लिए भी उधार ले रही है, जो अधिक चिंताजनक माना जाता है।
विस्तारकारी राजकोषीय नीति कब अपनाई जाती है?
मंदी या आर्थिक सुस्ती में — जब मांग कम हो और बेरोज़गारी बढ़ रही हो। सरकार खर्च बढ़ाकर या कर घटाकर लोगों के हाथ में अधिक धन पहुंचाती है, जिससे मांग, उत्पादन और रोज़गार बढ़ता है।
राजकोषीय गुणक क्या है?
यह बताता है कि एक रुपये के सरकारी खर्च से GDP में कितने रुपये की वृद्धि होती है। सरकारी खर्च से आय बनती है, वह आय खर्च होती है, और श्रृंखला चलती है। मंदी में गुणक बड़ा होता है क्योंकि बेकार संसाधन काम पर लगते हैं।
क्या सार्वजनिक ऋण हमेशा खतरनाक है?
नहीं। यदि ऋण उत्पादक निवेश (सड़क, स्कूल, बिजली) में लगा है जो भविष्य की आय बढ़ाता है, तो वह टिकाऊ है। खतरा तब है जब ऋण रोज़मर्रा के खर्च में जाए और ब्याज भुगतान राजस्व का बड़ा हिस्सा खाने लगे।